Tuesday , 22 August 2017
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गुरु अरजन देव : शहीदों के सरताज

शहीदी पर्व पर विशेष

श्री गुरु अरजन देव साहिब सिक्खों के पाँचवे गुरुजी है। एक बार बादशाह जहाँगीर का चंदू दिवान आपसे आपके बेटे श्री गुरु हरगोबिन्द साहिब जी का रिश्ता लेने के लिए आया। लेकिन चंदू दिवान के गुरुघर के बारे में गलत विचार जान कर आपने रिश्ता करने से इंकार कर दिया। इस बात से नाराज चंदू ने बादशाह जहाँगीर को भड़काना शुरू कर दिया।

बादशाह जहाँगीर तो पहले से ही गुरु जी के विरुद्ध था। वह तो अकबर के समय से यही चाहता था कि गुरु नानक देव जी के प्रचार को रोक दिया जाए। असल में जहाँगीर को यह बात पसंद नहीं थी कि मुसलमान गुरु जी के सेवक गुरु जी के सेवक बने। पर चुँकि गुरु जी सब से प्रेम करते थे और उनके उपदेश भी सभी के लिए होते थे,इसलिए उन के पास हर धर्म के लोग आते थे और श्रद्धा से उनके आगे शीश झुकाते थे।

गुरु जी के प्रति लोगों की बढ़ती हुई श्रद्धा जहाँगीर से बर्दाश्त नहीं हो रही थी। उसने गुरु साहिब जी को इस्लाम धर्म धारण करने के लिए कहा, पर गुरु जी ने इस बात से इंकार कर दिया। इस बात पर नाराज जहाँगीर चंदू के भड़कावे में आसानी से आते हुए गुरु जी से बदला लेने के लिए आतुर हो गया। उसने गुरु जी को बंदी बना लिया। गुरु जी और उनके साथ पाँच सिक्ख स्वयं ही लाहौर जाने के लिए राजी हो गए।

लाहौर पहुँच कर जहाँगीर ने गुरु जी से कुछ सवाल किए। जिनके गुरु जी ने उचित उत्तर दिए। इसके बाद जहाँगीर ने अपनी कुछ बातें मनवाने के लिए गुरु जी पर दबाव बनाया। जिसमें इस्लाम धर्म धारण करना और आदि ग्रंथ साहिब में कुछ बातों को शामिल करना आदि था। इन बातों को मानने के लिए गुरु जी तैयार नहीं थे। अंतत: उन्होंने कहा कि वो शरीर त्याग सकते है, पर धर्म नहीं। जब जहाँगीर की कोई भी शर्त नहीं मानी गई तो उसने गुरु जी को कष्ट दे कर शहीद करने का आदेश दे दिया।

गुरु जी को आषाढ महीने में तपती रेत में बिठाया गया। फिर गुरु जी को उबलते पानी में बिठाया गया। उसके बाद तपते हुए तवे पर बैठा कर ऊपर से गर्म रेत उन पर डाली  गई। जब उनका सारा शरीर फफोलों से भर गया तो उनके हाथ-पैर बाँध कर रावी दरिया में छोड़ दिया गया। इस प्रकार गुरु जी को अनेक कष्ट दे कर परेशान किया गया। और अंतत: शहीद कर दिया गया। किन्तु अंतिम समय तक गुरु साहब जी ने हर कष्ट को शांत चित्त होकर सहन किया, पर धर्म नहीं छोड़ा।

असीम कष्टों के बावजूद गुरुजी ने आह तक नहीं की। यही वजह है कि उनको शहीदों का सरताज माना जाता है। शहीदी पर्व पर उनको श्रद्धापूर्वक नमन !

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