Saturday , 23 October 2021
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बहुत गुणकारी हे ( दारू हल्दी ) ,जानिए इसके लाभ –

बहुत गुणकारी हे ( दारू हल्दी ) ,जानिए इसके लाभ –

बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि दारुहरिद्रा  एक बहुत ही उत्तम जड़ी-बूटी है और दारुहरिद्रा का प्रयोग बहुत सालों से चिकित्सा के लिए किया जा रहा है।आयुर्वेद में दारुहरिद्रा के उपयोग के बारे में बहुत सारी अच्छी बातें बताई गई हैं। दारूहरिद्रा का इस्तेमाल कान की बीमारी, आंखों के रोग, घाव को सुखाने के लिए, मुंह की बीमारी, चर्म रोग, डायबिटीज आदि रोगों में किया जाता है।

दारू हल्दी के लाभ –

बुखार में लाभदायक हे .

दारुहरिद्रा की जड़ की छाल से काढ़ा बनाएं। इसे 10-20 मिली की मात्रा में सेवन करने से साधारण बुखार और गंभीर बुखार में लाभ होता है।

घाव को सुखाने के लिए .

दारू हल्दी के जड़ की छाल को पीसकर लगाने से घाव जल्दी भर जाता हे

सूजन को ठीक करता है दारुहरिद्रा .

दारुहल्दी की जड़ का पेस्ट बनाएं। इसमें अपांप्म तथा सेंधा नमक मिलाकर लेप करने से सूजन ठीक हो जाती है।

आँखों की बीमारी में फायदेमंद दारुहरिदा का प्रयोग .

50 ग्राम दारुहल्दी पेस्ट को 16 गुना जल में पकाएं। इस काढ़ा को मधु मिला कर आंखों में काजल की तरह लगाने से आंखों के विकार ठीक होते हैं।

1 भाग रसांजन तथा 3 भाग त्रिकटु को मिलाकर 250 मिग्रा की गोलियां बनाएं। इसे जल में घिसकर काजल की तरह लगाने से आंखों की खुजली, आंखों का लाल होना आदि रोगों में लाभ होता है।

रसांजन, दारुहल्दी, हल्दी, चमेली और निम्बु के पत्ते लें। इन्हें गोबर के पानी में पीस लें। इसकी वर्ति बनाकर जल में घिसकर काजल की तरह लगाएं। इससे आंखों के पलकों से संबंधित विकारों में लाभ होता है।

बराबर-बराबर मात्रा में हरीतकी, सेंधा नमक, गैरिक तथा रसांजन का लेप बनाएं। इसे पलकों पर लेप करने से पलकों से संबंंधित रोगों में लाभ होता है।

दारुहल्दी तथा पुण्डेरिया की त्वचा का काढ़ा बनाएं। इसे कपड़े से अच्छी तरह छानकर आंखों में बूंद-बूंद डालें। इससे नेत्र रोग में फायदा होता है।

रसाञ्जन को आंखों में लगाने भी आंखों की बीमारी ठीक होती है।

दारुहरिद्रा के इस्तेमाल से जुकाम में लाभ .

दारुहल्दी की छाल के पेस्ट की वर्ति बनाएं। इसका धूम्रपान करने से जुकाम ठीक होता है।

मुंह के रोग में दारुहरिद्रा के उपयोग से फायदा .

दारुहल्दी काढ़ा का रसांजन बनाएं और मधु के साथ खाएं। इसके साथ ही लेप के रूप में प्रयोग करें। इससे मुंह का रोग, रक्त विकार तथा साइनस ठीक होता है।

चमेली के पत्ते, त्रिफला, जवासा, दारुहरिद्रा, गुडूची तथा द्राक्षा को मिलाकर काढ़ा बनाएं। 10-30 मिली काढ़ा को शहद में मिलाकर पीने से मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं।

दारुहरिद्रा के सेवन से पेट की बीमारी में लाभ.

दार्व्यादि काढ़ा (10-30 मिली) में 6 माशा मधु मिलाकर सेवन करने से सभी तरह के पेट के रोगों में लाभ होता है।

पीलिया में दारुहरिद्रा के इस्तेमाल से लाभ .

1.5 लीटर गोमूत्र, दारुहल्दी तथा कालीयक पेस्ट को 750 ग्राम भैंस के घी में पकाएं। इसे दार्वीघी कहते हैं। इसे 5 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से पीलिया में लाभ होता है।

दारुहल्दी के 5-10 मिली रस लें या निम्बू के पत्ते के रस या गुडूची के रस के साथ 1 चम्मच मधु मिलाकर पीने से भी पीलिया में फायदा होता है।

एनीमिया में लाभ पहुंचाता है दारुहरिद्रा का प्रयोग .

सुबह दारुहल्दी के रस (5-10 मिली) या काढ़ा (10-30 मिली) में मधु मिलाकर सेवन करें। इससे एनीमिया में फायदा होता है। यह पीलिया में भी लाभ पहुंचाता है।

कफज विकार में दारुहरिद्रा से फायदा .

कफज विकार को ठीक करने के लिए दारुहल्दी का प्रयोग लाभ देता है। दारुहल्दी के 2-4 ग्राम पेस्ट को गोमूत्र के साथ सेवन करें। इससे कफज-वृद्धि रोग का ठीक होता है

ल्यूकोरिया में फायदा पहुंचाता है दारुहरिद्रा .

दार्व्यादि काढ़ा (10-30 मिली) में मधु मिलाएं अथवा रसांजन एवं चौलाई की जड़ के पेस्ट में मधु मिला कर चावल के धोवन के साथ पिएं। इससे सभी तरह की ल्यूकोरिया ठीक होती है।

दारुहरिद्रा, रसाञ्जन, नागरमोथा, वासा, चिरायता, भल्लातक तथा काला तिल लें। इससे काढ़ा बना लें। 10-30 मिली काढ़ा में मधु मिलाकर पीने से ल्यूकोरिया रोग में लाभ होता है।

दारुहल्दी, रसाञ्जन, नागरमोथा, भल्लातक, बिल्वमज्जा, वासा पत्ते और चिरायता का काढ़ा बना लें। इस काढ़ा में 1 चम्मच मधु मिलाकर पीने से गर्भाश्य में सूजन आदि के कारण होने वाली ल्यूकोरिया की  बीमारी सहित पेट के रोगों में लाभ होता है।

रसौत को बकरी के दूध के साथ सेवन करने से ल्यूकोरिया में लाभ होता है।

रसौत एवं चौलाई की जड़ से पेस्ट बनाएं। इसमें मधु मिलाकर चावल के धोवन के साथ पीने से सभी दोषों के कारण होने वाली ल्यूकोरिया में फायदा होता है।

सूजाक को ठीक करने के लिए करें दारुहरिद्रा का उपयोग .

दारुहल्दी के तने का काढ़ा बनाएं। इसमें हल्दी मिलाकर लगाने से सुजाक रोग में लाभ होता है।

दारुहरिद्रा के इस्तेमाल से सिफलिस रोग में लाभ .

रसौत, शिरीष की छाल तथा हरीतकी को समान मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें।  इसमें मधु मिलाकर सिफलिश के घाव पर लगाएं। इससे घाव भर जाते हैं।

रसौत, शिरीष की त्वचा तथा हरीतकी का बारीक चूर्ण (1-4 ग्राम) लें। इसमें मधु मिलाकर सिफलिश के घाव पर लेप के रूप में  लगाएं। इससे घाव ठीक हो जाता है।

कुष्ठ रोग में लाभदायक दारुहरिद्रा .

दारुहल्दी त्वचा के पेस्ट को तेल में पका लें। इस तेल को घाव पर लगाने से घाव ठीक होता है।

दारुहल्दी के पेस्ट (2-4 ग्राम) को गोमूत्र के साथ सेवन करने से कुष्ठ रोगों में लाभ होता है।

दारुहल्दी के काढ़ा से रसाञ्जन बनाएं और इसे तेल या घी में पकाएं। इसे पाउडर तथा चूर्ण की तरह प्रयोग करने से कुष्ठ रोग में बहुत लाभ होता है।

बराबर-बराबर मात्रा में दारुहल्दी, खैर तथा नीम की छाल का काढ़ा बनाएं। इसे 10-30 मिली की मात्रा में नियमित रूप से पीने से सभी प्रकार के कुष्ठ रोगों में लाभ होता है।

दारुहल्दी की जड़ीबीज, हरताल, देवदारु तथा पान के पत्ते को बराबर-बराबर मात्रा में लें। इसमें चौथाई भाग शंखचूर्ण मिलाएं। इसे जल में पीस लें। इसका लेप करने से सिध्म जैसे कुष्ठ रोग में लाभ होता है।

विसर्प रोग में करें दारुहरिद्रा का इस्तेमाल .

दारुहल्दी छाल, वायविडंग तथा कम्पिल्लक से काढ़ा बना लें और इसे तेल में पका लें। इसे विसर्प रोगों में उपयोग करें। इससे लाभ होता है।

मूत्र रोग में लाभ पहुंचाता है दारुहरिद्रा .

दारुहल्दी के चूर्ण को मधु के साथ सेवन करें। इसमें आंवले का रस पीने से मूत्र रोगों में तुरंत लाभ होता है।

दारुहरिद्रा से डायबिटीज में फायदा .

10-30 मिली दारुहल्दी के काढ़ा को मधु के साथ नियमित सेवन करने से डायबिटीज रोग में लाभ होता है।

लिवर-तिल्ली विकार में दारुहरिद्रा से लाभ .

दारुहरिद्रा की जड़ की छाल से बने काढ़ा 10-30 मिली को पीने से लिवर और तिल्ली से जुड़े विकार ठीक होते हैं।

कीड़े-मकौड़ों के काटने पर दारुहरिद्रा का उपयोग लाभदायक .

दारुहल्दी आदि द्रव्यों से बने गौराद्य घी का प्रयोग करें। इससे विषैली कीड़े-मकौड़े और अन्य कीटों के काटने वाले स्थान पर लगाएं। इससे फायदा होता है।

सांप के काटने पर दारुहरिद्रा का प्रयोग फायदेमंद 

सांप के काटने पर भी दारुहल्दी बहुत फायदा करता है। हल्दी एवं दारुहल्दी का विविध प्रयोग सांप के काटने के स्थान पर लगाएं। इससे फायदा होता है।

 

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