Wednesday , 18 July 2018
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HIV AIDS ka ilaj पूरी जानकारी – बचाव और रामबाण घरेलु इलाज.

HIV AIDS ka ilaj पूरी जानकारी – बचाव और रामबाण घरेलु इलाज.

HIV AIDS KI JANKARI BACHAV AUR SAHAYAK ILAJ, hiv ayurvedic treatment in hindi

hiv aids एड्स जिसका पूरा नाम है “एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशियंसी सिंड्रोम”. यह रोग पहली बार 1981 में अमरीका के लॉस एंजिलिस और न्यू यॉर्क जैसे बड़े शहरों के चिकित्सकों को तब पता चला जब उनके पास “समलैंगिक यौन क्रिया” के कुछ व्यक्ति अपना इलाज कराने आये. कई तरह की जांच और इलाज के बाद भी रोग ला इलाज रहा और वो लोग बचाए ना जा सके. लेकिन ये तथ्य सामने आया के समलैंगिको की रोग प्रतिरोधक शक्ति नष्ट हो चुकी थी. प्राण लेवा यह बीमारी तब से संसार के अनेकों विकसित और अविकसित देशों में लोगों को अपने मुंह में खींच रही है.

एड्स ला इलाज क्यों हैं. Hiv Aids ka rog La ilaj kyon hai ?

एड्स के ला इलाज होने का प्रमुख कारण अति सूक्षम H.I.V. रेट्रोवायरस है जिसके दो प्रकार – टाइप – 1 और टाइप – II पाए गएँ हैं. पहले दोनों को टाइप – III (H.T.L.V. III) कहा जाता था. ये शरीर की रक्षा करने वाली श्वेत कणों को नष्ट कर देते हैं.

[Safed Daag ka ilaj]

HIV aids KYA HAI ?

H.I.V. – Human Immuno Deficiency Virus अर्थात मानव की प्रतिरक्षा प्रणाली को नष्ट करने वाला विषाणु.

मनुष्य के शरीर में रोगों से बचाव के लिए विशेष व्यवस्था है. खून में पाए जाने वाले सफ़ेद कोशाणु जिनको White Blood Corpuscles या  WBC कहा जाता है जो रोगों से बचाव के लिए महत्वपूर्ण हैं इस के अलावा शरीर के कई अंग जैसे जिगर, तिल्ली, लसिका ग्रंथियां व् थाईमस ग्रंथि एक रोग प्रतिरोधक प्रणाली बनाते हैं. जिसमे रोग के जीवाणु या विषाणुओं को शरीर में घुसते ही प्रभावहीन और नष्ट करने की क्षमता है. इसी के अंतर्गत एक जटिल प्रक्रिया द्वारा कुछ प्रतिरक्षा तत्व या पिंड और प्रतिजन भी बनाये जाते हैं. जो शरीर को बहरी संक्रमण से बचाने की शक्ति प्रदान करते हैं. यह रोग प्रतिरोधक शक्ति लम्बे समय तक शरीर में बनी रहती है. यह शक्ति सफ़ेद कोशाणुओं के विशेष प्रकार के टी – 4 लिम्फोसाईट कोशाणुओं में होती है, और इन्ही कोशाणुओं को एड्स का विषाणु H.I.V. नष्ट कर देता है. जिस कारण शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली ध्वस्त हो जाती है और इस कारण मनुष्य रोगों का मुकाबला और अपना बचाव करने में असमर्थ हो कर तरह तरह के रोगों का शिकार हो कर शीघ्र ही मृत्यु मुख में समा जाता है.

H.I.V. शरीर में कैसे प्रवेश करता है ? H.I.V. AIDS KAISE HOTA HAI ?

H.I.V. AIDS मुख्यतः चार प्रकार से होता है.

  1. यौन सम्बन्ध द्वारा
  2. प्रदूषित रक्त द्वारा
  3. सुई के द्वारा
  4. माँ द्वारा गर्भ स्थित बालक में संक्रमण पहुँचने में.

1. यौन सम्बन्ध द्वारा H.I.V. संक्रमण – UNSAFE SEX SE H.I.V. AIDS

जो स्त्री या पुरुष एक से अधिक पुरुष या स्त्रियों के साथ सम्भोग करते है, उनमे इस रोग की सम्भावना ज्यादा होती है, इस तरह ये रोग संक्रिमित स्त्री पुरुष से यौन क्रिया के दौरान आगे फैलता जाता है. संक्रमित व्यक्ति के सिर्फ वीर्य या रज के अलावा उसके शरीर के सभी तरल पदार्थ में ये वायरस रहता है जैसे उसके खून, आंसू, मूत्र, लार, स्तन के दूध, मस्तिष्क मेरु तरल आदि, मगर इनमे विषाणुओं की संख्या बहुत कम होती है. और यदि मुंह में छाले हो गए हों तो ये चुम्बन से भी फ़ैल सकता है.

2. संक्रमित रक्त द्वारा. Infected blood se H.I.V. AIDS.

H.I.V. AIDS से ग्रसित मनुष्य के रक्त में भी H.I.V. का वायरस मौजूद रहता है, इस कारण जब इस रोग से संक्रमित रोगी का रक्त किसी दुसरे रोगी को चढ़ा दिया जाए तो निश्चित ही खून लेने वाला व्यक्ति H.I.V. AIDS से ग्रसित हो जायेगा. इसलिए हमेशा खून चढाने से पहले उसका टेस्ट ज़रूर करवा लेना चाहिए.

3. सुई से एड्स का फैलना. Infected Syringe se H.I.V. AIDS

सुई जैसे कोई दवा का इंजेक्शन देते हुए एक ही सुई जब दो या दो से अधिक व्यक्तियों पर इस्तेमाल हो जाए तो ये भी H.I.V. AIDS के वायरस फैलने का एक कारण है. ऐसे में संक्रमित व्यक्ति का खून सुई के ज़रिये दुसरे व्यक्ति के खून में सीधे प्रवेश कर के उस को भी H.I.V. AIDS का रोगी बना देता है.

इसके साथ जो लोग आजकल TATTOO बनवाते हैं वो भी एक ही गोदने का इस्तेमाल करते हैं. वो भी अगर H.I.V. AIDS संक्रमित के TATOO गोदने के बाद दुसरे व्यक्ति के वही गोदने से TATOO गोद दे तो ये भी H.I.V. AIDS के वायरस का एक कारण हो सकता है. इसलिए TATOO बनवाने वाले विशेष ध्यान देवें.

4. माँ द्वारा गर्भ स्थित बालक में संक्रमण पहुँचने में. – GARBH ME H.I.V. AIDS HONA

H.I.V. AIDS से पीड़ित स्त्री गर्भवती हो जाए तो गर्भ में बढ़ रहे बच्चे को भी विषाणु का संक्रमण हो जाता है. इस हालत में जन्म लेने वाला बच्चा जन्मजात एड्स रोगी हो जाता है. प्रसव काल के दौरान भी संक्रमित माँ से शिशु यह रोग पा सकता है. स्तन पान कराने वाले बच्चों को भी एड्स संक्रमण हो सकता है.

H.I.V. AIDS के लक्षण – AIDS KE LAKSHAN

एड्स के विषाणु शरीर में प्रवेश करने के बाद, और कुछ समय तक शरीर में बने रहने के बाद भी कुछ लोगों को शुरू में काफी समय तक कोई  तकलीफ नहीं होती और वो सामान्य ही लगते हैं. लेकिन दूसरों को संक्रमित कर देने में समर्थ हो जाते हैं. दुसरे कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनमे एड्स के थोड़े थोड़े लक्षण नज़र आते हैं. और दो तीन वर्षों में ये लक्षण गंभीर रूप धरण कर लेते हैं. तथा तीसरी श्रेणी में कुछ लोग ऐसे होते हैं. जिनमे संक्रमण लगने के डेढ़ दो महीनों के भीतर गंभीर लक्षण प्रकट हो जाते हैं. इनमे कुछ लक्षण निमिन्लिखित हैं.

H.I.V. AIDS के लक्षण.- AIDS KE LAKSHAN

AIDS के रोगी का वजन घटना शुरू हो जाता है. दो तीन महीने में उसका वजन 4-5 किलो तक घटना शुरू हो जायेगा.

बार बार दस्त लगना और काफी समय तक ठीक ना होना.

बारम्बार बुखार होना या हरदम बुखार रहना.

शरीर की लसिका ग्रंथियों जैसे गले, कांख, जांघ की ग्रंथियों में सूजन आना.

मुंह तथा कंठ में छाले या जख्म हो जाना, खांसी होना, और निरंतर बलगम आना, एड्स के 60 प्रतिशत रोगियों से भी ज्यादा में टी.बी. की शिकायत देखने को मिलती है.

त्वचा रोग जैसे चकते और खुजली होना, त्वचा का पीला पड़ना इत्यादि.

भूख ना लगना, भोजन में अरुचि, रात में पसीने आना.

 

शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने से उपरोक्त रोग बने ही रहते हैं. शरीर निरंतर कमज़ोर होता जाता है. फेफड़ो में टी.बी. न्युमोनिया जैसे रोग हो जाते हैं. मस्तिष्क व् स्नायविक तंत्र पर भी असर पड़ने से मानसिक विक्षिप्तता मस्तिष्क सुषुम्नाच्छद शोथ भी हो जाता है. आँखों की रौशनी नष्ट हो सकती है. स्त्रियों में योनी की शोथ, खुजली तथा अत्यधिक रक्तस्त्राव पाया जाता है. ऐसे अनेकों रोग शरीर पर एक साथ या बारी बारी आक्रमण कर सकते हैं और अंत में 2 से 5 वर्ष के भीतर ही मृत्यु हो जाती है. बच्चे तो 2 वर्ष के भीतर ही दम तोड़ देते हैं.

H.I.V. AIDS TEST

H.I.V. AIDS के लिए लैब में ब्लड या शरीर के अन्य तरल पदार्थ ले कर टेस्ट किया जाता है. आज कल ये शहरों में सर्वत्र ही उपलब्ध है.

H.I.V. AIDS की रोकथाम के उपाय – H.I.V. AIDS PREVENTION

विवाह से पहले किसी से यौन सम्बन्ध ना बनायें, और विवाह के बाद भी सिर्फ अपने जीवन साथी से ही यौन सम्बन्ध रखें.

आदत से लाचार व्यक्तियों को वेश्यागमन करते समय कंडोम का उपयोग करना चाहिए.

रक्त लेने से पहले रक्त की जांच ज़रूर करवा लेवें.

सिरिंज जब भी लगे तो उसको बदलवा लेना चाहिए. अगर बदलने का प्रावधान ना हो तो उसको अत्यंत गर्म पानी में अच्छे से उबाल कर ही दोबारा इस्तेमाल करें.

एड्स ग्रस्त स्त्रियों को गर्भ धारण नहीं करना चाहिए.

एड्स रोगियों की जांच के समय प्रयुक्त किये जाने वाले औजारों को विसंक्रमित (STERILIZE) कर लेना चाहिए.

एड्स ग्रस्त बच्चों में जांच करने के बाद अगर H.I.V. का पता ना चले तो B.C.G. और D.P.T. पोलियो, खसरा की वैक्सीन का टीका दे देना चाहिए. और यदि जांच में एड्स का पता चल जाए तो B.C.G. का टीका नहीं देना चाहिए.

शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थियों को तथा माता पिता को अपने बच्चों को एड्स के बारे में तथा इस रोग से बचाव के बारे में बताना चाहिए.

एड्स की शंका होने पर जांच केन्द्रों में इस रोग की जांच अवश्य करा लेनी चाहिए.

हर तीन महीने के बाद वजन करना, खून की जांच करना, यकृत के कार्यों की जांच तथा अन्य आवश्यक जांच हो जाने से एड्स के साथ होने वाले अन्य संक्रमणों से बचा जा सकता है.

एड्स ग्रस्त रोगी के खून, विष्ठा व् अन्य तरल को छोटे या उठाते समय हाथों में दस्ताने व् शरीर पर गाउन पहन लेना चाहिए.

वीर्य दान करने वालों के वीर्य की जांच कर लेनी चाहिए.

 

गर्भ के शिशु को AIDS से बचाने का तरीका. GARBH KE SHISHU KO AIDS SE KAISE BACHAYE

एड्स ग्रस्त माँ के बालक को संक्रमण माँ के गर्भ में प्रसव के दौरान या स्तन पान के समय लगता है, ऐसे में Delivery योनी मार्ग से अर्थात नार्मल ना करवा कर Operation से करवानी चाहिए. और अगर संतान को 38 सप्ताह अर्थात 8 महीने या उस से भी पहले हो सके तो पहले ही जन्म दे देना चाहिए. ऐसा करने से बालक को संक्रमण से बचाया जा सकता है.

H.I.V. AIDS में विशेष :- HIV AIDS IMPORTANT TIPS

H.I.V. AIDS के रोगी के पास बैठने, हाथ मिलाने, एक साथ भोजन करने पानी पीने आलिंगन करने से यह रोग नहीं फैलता . ध्यान केवल ये रखना है के जब रोगी से हाथ मिलाएं या उसके पास जाएँ तो अपनी त्वचा कटी, फटी, छिली, या घाव युक्त ना हो, जहाँ से H.I.V. AIDS के विषाणु प्रवेश कर सकें.

एड्स रोगियों को प्रेम, सहानुभूति और सदव्यवहार की बहुत ज़रूरत है. इस रोग के सभी लक्षणों जैसे – बुखार, दस्त, चमड़े में खुजली, शरीरिक पीड़ा आदि को कुछ हद तक कम करने के लिए उपचार दें. साथ साथ व्यक्तिगत सफाई और सामान्य दैनिक जीवन चर्या करते रहने के लिए प्रोत्साहित करते रहें.

H.I.V. AIDS में सहायक घरेलु उपचार – HIV AIDS HOME REMEDY

आधुनिक विज्ञान में H.I.V. AIDS की कोई दवा अभी तक नहीं बनी और जैसा के आपने ऊपर में पढ़ा के H.I.V. AIDS का विषाणु शरीर में मौजूद हमारी रोग प्रतिरोधक प्रणाली को ध्वस्त करना शुरू करते हैं जिसके फलस्वरूप शरीर विभिन्न रोगों की गिरफ्त में आता है. इसलिए इसके रोगी को सबसे पहले अपनी रोग प्रतिरोधक प्रणाली को विकसित करना अहम् काम है.

1. इसके लिए रोगी को रोजाना प्राणायाम और योग का सहारा लेना चाहिए. कम से कम 1-1 घंटा सुबह शाम प्राणायाम और योगासन ज़रूर करें.

2. रोगी को अपने शरीर का PH Level सुधारने के लिए हर रोज़ सुबह लौकी, पत्तागोभी, या कद्दू (Pumpkin), इनमे से किसी एक का जूस ज़रूर पीना चाहिए. इस से धीरे धीरे शरीर का Ph Level सुधरेगा और रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होगा.

3. और इसके साथ में *तुलसी का रस (विशेष श्याम तुलसी) बहुत लाभदायी है. 5 मिली से 50 मिली जितना रोगी आसानी से पी सके.

4. *गिलोय का रस हर रोज़ 30 मिली से 100 मिली सुबह शाम जितना आसानी से पच सके.

5. *गेंहू के जवारे का रस भी रोज़ सुबह शाम 30 मिली से 100 मिली तक पियें.

6. किसी भी रूप में बेल के फल (बिल्व – जिसको शिव जी पर चढ़ाया जाता है) का सेवन इसमें बहुत फायदेमंद है. इसका आचार, चूर्ण या मुरब्बा या शेक कैसे भी इसका रोजाना सेवन करें.

इसके साथ में रोगी को जो भी रोग लगे उस का उपचार साथ साथ करना चाहिए.

महत्वपूर्ण लिंक्स – HIV AIDS IMPORTANT LINKS

दही तुलसी अमृत

आयुर्वेद की अमृत – गिलोय

पृथ्वी की संजीवनी – गेंहू के जवारे.

दोस्तों आपको हमारा ये लेख कैसा लगा आप अपने बहुमूल्य कमेंट ज़रूर देवें. धन्यवाद.

7 comments

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  2. Kya hiv ka aayubedic upchar hai…

    • aap is lekh ko acche se padhkar isme bataye gaye gharelu upchar kijiye. apko hiv ka ayurvedic ilaj inhi se mil jayega.

  3. Kya hiv ke aayurbed ilaj hai

    • ye upar jo humne bataye hai, ye ilaj bahut hi mahatvpurn hai, inko aazmaye, acche se dobara padh lijiye, inko apnane se aapko zarur fayda hoga.

  4. Hiv aids treatment in hindi, if patient regular follow these above given remedies, then he can cure hiv aids.

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