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आयुर्वेद की शाखा है एलोपैथी – ये लेख पढ़कर बड़ों बड़ों को आ जायेगा यकीन

आयुर्वेद की शाखा है एलोपैथी

प्रस्तुति: फरहाना ताज

एलोपैथी की अनेक दवाईयां जड़ी बूटी से तैयार होती हैं, बूटी से बोटनी शब्द बना है, उदाहरण के लिए जैसे कुनैन बनती है सिनकोना के पेड़ की छाल से…कैंसर की दवाएं बनती हैं तुलसी से…ऐसी ही बहुत सी दवाएं हैं जिनके पेटेंट एलोपैथी के नाम से हैं, लेकिन सचाई यह है कि एलोपैथी कोई नया चिकित्सा विज्ञान नहीं है, यह तो आयुर्वेद का ही एक भाग है। यकीनन नीचे शब्दों का अवलोकन करें कि कैसे वे संस्कृत के ही हैं।
एलोपैथी में अनेक शब्द ऐसे हैं, जिन्हें ध्यान से देखें तो आप आसानी से पहचान जाएंगे कि वे संस्कृत के किसी मूल शब्द के ही पर्यायवाची शब्द हैं। यहाँ हम कुछ ऐसे ही शब्दों पर विचार करेंगे:

Gland –  ग्रंथि

Prostate Gland – प्रस्थित ग्रंथि

Doctor – दुःखतार

Stethoscope – स्थिति पश्यति

Anatomy – अनात्मी

Cerebrum –  शिर-ब्रह्म

Cardiology – हृदय-लग

Cardiogram –  हृदय-ग्रथ

Asthma – यक्ष्मा

Patient – प्रशांत

Nose – नासा

Surgeon – शल्यजन

Derm – चर्म

Matrix – मातरिक्ष

Cough – कफ़

Phlegm – श्लेष्म

Dentistry  – दन्त शास्त्र

Pancreas – पाचन क्रिया

Mouth – मुख

Foot – पाद

चिकित्सा शास्त्र के जनक आर्य ही हैं। वर्तमान यूरोपीय चिकित्सा शास्त्र का आधार भी आयुर्वेद है। लार्ड एन्पिथल ने एक भाषण में कहा था कि मुझे यह निश्चय है कि आयुर्वेद भारत से अरब में और वहाँ से यूरोप में गया। भोज प्रबंध में बेहोश कर शल्यकर्म करने का उल्लेख है। ऋग्वेद में असली बाहु कट जाने पर कृत्रिम बाहु लगाते हुए देव का वर्णन आया है। ऋग्वेद में कटा हुआ सिर भी शल्य चिकित्सा से जोड़ने का विधान है। प्राचीन काल में मृत व्यक्ति की आँखें निकालकर चक्षुहीन को लगाई जाती थी। शरीर की टूटी-फूटी कोशिकाओं की मरम्मत करके युवा अवस्था को काफी समय तक बरकरार रखा जाता था। च्यवन ऋषि को तो वृद्धावस्था से युवावस्था प्राप्त हो गई थी।

च्यवनप्राश क्या आयुवर्धक (रीजनरेटिव) औषधि आज नहीं है? ऋग्वेद में मानव शरीर का पंचभूतों से बनने का उल्लेख एवं एक हजार औषधियों का वर्णन है। ऋषि-मुनियों के अनुसार, अथर्ववेद को वेद में भेषजा कहा गया है इससे बड़ी साक्षी वेदों में औषधियों के वर्णन की और क्या होगी? अथर्ववेद में रोगों के नाम एवं उनके लक्षणों तक का ही नहीं, बल्कि मनुष्य की शरीर की 206 हड्डियों का वर्णन तक है। वेदों में जर्म थ्योरी पाई जाती है। प्रो. मैकडानल ने लिखा है कि ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में अदृष्ट शब्द एक प्रकार के कृमियों के लिए आया है। वेद मंत्रों में सूर्य को ऐसे कृमियों का नाशक कहा गया है, अथर्ववेद में तो दृष्ट तथा अदृष्ट कृमियों (भूत-प्रेतों) का विस्तृत वर्णन है। वात्स्यायन प्रणीत कामसूत्रा में रज व वीर्य का वैज्ञानिक विधि से विस्तृत वर्णन है। अथर्ववेद में 15 प्रकार की शल्य चिकित्सा का वर्णन है।

प्राचीन आर्य कृत्रिम दांतों का बनाना और लगाना तथा कृत्रिम नाक बनाकर सीना भी जानते थे। दांत उखाड़ने के लिए एनीपद शस्त्रा का वर्णन मिलता है। मोतियाबिन्द (कैटेरेक्ट) के निकालने के लिए भी शस्त्र था। बाग्भट्ट ने शल्यकर्मों के यंत्रों की संख्या 115 लिखी है। प्राचीन काल में आर्य सूक्ष्म ऑपरेशन करते थे। कटी हुई नाक को जोड़ने की विधि यूरोपियनों ने भारतीयों से सीखी।

अथर्ववेद के बाद ईसा से लगभग 600 वर्ष पूर्व काय चिकित्सा पर ‘चरकसंहिता’ और शल्य चिकित्सा पर ‘सुश्रुत संहिता’ मिलती हैं।

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