Saturday , 21 July 2018
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फेफड़ो में पानी या सूजन (Pleurisy) का घरेलू उपचार onlyayurved

फेफड़ों का हमारे शरीर में बहुत ही महत्वपूर्ण रोल है। जीवित रहने के लिए सांस लेना जरूरी है। सांस लेने के लिए स्वस्थ फेफड़े का होना अति आवश्यक है।

हमारे शरीर में फेफड़ों का मुख्य कार्य वातावरण से ऑक्सीजन लेकर उसे रक्त परिसंचरण मे प्रवाहित करना और रक्त से कार्बन डाइऑक्साइड को शोषित कर उसे बाहर वातावरण में छोड़ना है।

आखिर यह छाती में पानी का जमाव है क्या?

छाती के अन्दर फेफड़े के चारों ओर पानी के जमाव को मेडिकल भाषा में ‘प्ल्यूरल इफ्यूजन’ या ‘हाइड्रोथोरेक्स’ कहते हैं। जब पानी की जगह खून का जमाव होता है तो इसे ‘हीमोथोरेक्स’ कहते हैं। जब ‘लिम्फ’ नामक तरल पदार्थ का जमाव होता है तो इसे ‘काइलोथोरेक्स’ कहते हैं। फेफडे और छाती की दीवार के बीच खाली जगह होती है जिसमें फेफड़ा स्वतंत्र रूप से साँस लेने के वक्त नियमित रूप से फैलता और सिकुड़ता है। इस खाली जगह को मेडिकल भाषा में ‘प्ल्यूरल स्पेस’ कहते हैं।

सामान्यत: फेफ ड़े की ऊपरी सतह से पानी नियमित रूप से रिसता रहता है, कभी कभी पानी पेट से भी छेदों के जरिये छाती के अन्दर पहुँचता रहता है। साधारणत: एक नार्मल व्यक्ति में यह खाली जगह में रिसा हुआ पानी को छाती की अन्दरूनी दीवार लगातार सोखती रहती है जिसके परिणामस्वरूप इस ‘प्ल्यूरल स्पेस’ में कभी पानी इकट्ठा हो ही नहीं पाता। छाती की अन्दरूनी दीवार में लगभग बीस गुना फेफड़े के ऊपरी सतह से रिसते पानी को सोखने की क्षमता होती है।

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इस वजह से पानी रिसने व सोखने के बीच एक संतुलन बना रहता है। पर जब किसी वजह या बीमारी के कारण फेफड़े के ऊपरी सतह से पानी रिसने की मात्रा प्रचंड हो जाए या छाती की दीवार की सोखने की क्षमता में भारी कमी आ जाए तो यह सूक्ष्म संतुलन बिगड़ जाता है और फेफड़े के चारों ओर छाती के अन्दर पानी या तरल पदार्थ इकट्ठा होना षुरू हो जाता है। यहीं से ‘प्ल्यूरल इफ्यूजन’ की भूमिका बन जाती है।

छाती में पानी के जमाव के लक्षण:-

 
फेफड़ो में पानी या सूजन (Pleurisy) में फेफड़े के पर्दे में पानी भर जाता है। फेफड़ो में सूजन हो जाती हैं. रोगी को ज्वर होता है, सांस रुक-रुक कर आता है, छाती में दर्द रहता है आदि लक्षण होते है। आयुर्वेद में इसका उपचार बहुत ही आसान हैं। तो चलिए जानते है ये उपचार कौन से है।बुखार जो पसीने के साथ प्रतिदिन षाम को तेज़ हो जाता हो ,वज़न में गिरावट,साँस फूलना या साँस लेने में छाती में दर्द होना,बलगम का आना,शरीर को हिलाने में छाती में गढ़ गढ़ की आवाज़ होना, छाती के बाँयी या दाहिनी ओर भारीपन का अहसास होना आदि ।

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फेफड़ो में पानी या सूजन (Pleurisy) का घरेलू उपचार

इस बीमारी में तुलसी के ताजा पत्तों का रस 15 ग्राम से 30 ग्राम हर रोज बढ़ाते हुए सुबह और शाम दिन में दो बार खाली पेट लेने से प्लूरिसी (Pleurisy) में शीघ्र लाभ होता है। बुखार दो तीन दिन में नीचे उतरकर सामान्य हो जाता है। आठ दस दिन में फेफड़े के पर्दे में भरा पानी सूख जाता है। किसी भी कारण से यह बीमारी क्यों न हो।बिना किसी अन्य बुरे प्रभाव के पक्का लाभ होता है। फेफड़ो और ह्रदय की अन्य बीमारियां और समस्याएं भी इससे ठीक हो जाती है।

विभिन्न औषधियों से उपचार-

1. बालू : बालू (रेत) या नमक को किसी कपडे़ में बांधकर हल्का सा गर्म करके सीने पर सेंकने से फेफड़ों की सूजन में बहुत अधिक लाभ मिलता हैं और दर्द भी समाप्त हो जाता है।

2. अलसी : अलसी की पोटली को बनाकर सीने की सिंकाई करने से फेफड़ों की सूजन के दर्द में बहुत अधिक लाभ मिलता है।

3. तुलसी : तुलसी के पत्तों का रस 1 चम्मच प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करने से सूजन में बहुत अधिक लाभ मिलता है।

4. पुनर्नवा : पुनर्नवा की जड़ को थोड़ी सी सोंठ के साथ पीसकर सीने पर मालिश करने से सूजन व दर्द समाप्त हो जाता है।

5. लौंग : लौंग का चूर्ण बनाकर 1 ग्राम की मात्रा में लेकर शहद व घी को मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से खांसी और श्वांस सम्बन्धी पीड़ा दूर हो जाती है।

6. घी : घी में भुना हुआ हींग लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से लगभग 1 ग्राम की मात्रा में पानी मिलाकर पीने से फेफड़ों की सूजन में लाभ मिलता है।

7. खुरासानी कुटकी: वक्षावरण झिल्ली प्रदाह या फुफ्फुस पाक में तीव्र दर्द होता है। ऐसे बुखार में खुरासानी कुटकी की लगभग आधा ग्राम से लगभग 1 ग्राम की मात्रा में चूर्ण शहद के साथ सुबह-शाम सेवन करने से फेफड़ो के दर्द व सूजन में लाभ मिलता है।

8. मजीठ : मजीठ का चूर्ण 1 से 3 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन 3 बार सेवन करने से फेफड़ों की सूजन और दर्द में बहुत अधिक लाभ मिलता है।

9. कलमीशोरा : कलमीशोरा लगभग 2.40 ग्राम से 12.20 ग्राम पुनर्नवा, काली कुटकी, सोंठ आदि के काढ़े के साथ सुबह-शाम सेवन करने से प्लूरिसी में लाभ मिलता है।

10. गुग्गुल : गुग्गुल लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से लगभग 1 ग्राम मात्रा लेकर गुड़ के साथ प्रतिदिन 3-4 मात्राएं देने से फेफड़ों की सूजन व दर्द में काफी लाभ मिलता है।

11. धतूरा : फुफ्फुसावरण की सूजन में धतूरा के पत्तों का लेप फेफड़े के क्षेत्र पर छाती और पीठ पर या पत्तों के काढ़े से सेंक या सिद्ध तेल की मालिश पीड़ा और सूजन को दूर करती है।

12. नागदन्ती : नागदन्ती की जड़ की छाल 3 से 6 ग्राम की मात्रा को दालचीनी के साथ देने से वक्षावरण झिल्ली प्रदाह (प्लूरिसी) में बहुत लाभ मिलता है।

13. विशाला : विशाला (महाकाला) के फल का चूर्ण या जड़ की थोड़ी सी मात्रा में चिलम में रखकर धूम्रपान करने से लाभ मिलता है।

14. अगस्त : अगस्त की जड़ की छाल पान में या उसके रस में 10 से 20 ग्राम मात्रा को शहद के साथ सुबह-शाम सेवन करने से कफ निकल जाता है, पसीना आने लगता है और बुखार कम होने लगता है।

15. पालक : पालक के रस के कुल्ला करने से फेफड़ों और गले की सूजन तथा खांसी में लाभ होता हैं।

16. पुनर्नवा : लगभग 140 से 280 मिलीलीटर पुनर्नवा की जड़ का रस दिन में 2 बार सेवन करने से फेफड़ों में पानी भरना दूर होता है।

17. त्रिफला : 1 ग्राम त्रिफला का चूर्ण, 1 ग्राम शिलाजीत को 70 से 140 मिलीलीटर गाय के मूत्र में मिलाकर दिन में 2 बार लेने से फेफड़ों में जमा पानी निकल जाता है और दर्द में आराम मिलता है।

18. अर्जुन : अर्जुन की जड़ व लकड़ी का चूर्ण बराबर मात्रा में लेकर 3 से 6 ग्राम की मात्रा में 100 से 250 मिलीलीटर दूध के साथ दिन में 2 बार लेने से फेफड़ों में पानी भरना ठीक होता है।

19. तुलसी : फेफड़ों की सूजन में तुलसी के ताजा पत्तों के रस आधा औंस (15 मिलीलीटर) से एक औंस (30 मिलीलीटर) धीरे-धीरे बढ़ाते हुए सुबह-शाम दिन में दो बार खाली पेट लेने से फेफड़ों की सूजन में शीघ्र ही आश्चर्यजनक रूप से लाभ मिलता है। इससे दो-तीन दिन बुखार नीचे उतरकर सामान्य हो जाता है और एक सप्ताह या अधिक से अधिक 10 दिनों में सूख जाता है।

भोजन और परहेज :

फेफड़ों की सूजन में रोगी को ठंड़ी वातावरण से अलग रखना चाहिए और ठंड़े खाद्य पदार्थ का सेवन नहीं करना चाहिए। इस रोग में खांसी अधिक आती है। इसलिए खांसी को नष्ट करने वाली औषधियों का सेवन करना चाहिए। रोगी को गेहूं, मूग की दाल, शालि चावल, बकरी का दूध, गाय का दूध आदि का सेवन करना चाहिए। भारी आहार, दही, मछली, शीतल पेय आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। इस रोग में ठंडा और कफ रहित आहार लें बल्कि हल्का व पचने वाला आहार लें।

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